बुधवार, 17 मार्च 2021

जंग ए आजादी स्मारक करतारपुर जलंधर पंजाब के बारे में विस्तार सहित जानकारी


भारत देश को आजाद करवाने के लिए जिन लोगों ने योगदान दिया, उनकी याद में जंग ए आजादी स्मारक का निर्माण करवाया गया है। जंग ए आजादी स्मारक पंजाब के जलंधर शहर के पास करतारपुर कस्बे में किया गया है। करतारपुर जलंधर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसका क्षेत्रफल 25 एकड़ है। इस स्मारक की बाहरी बनावट को देख कर सैलानी खुद ब खुद इसके अंदर प्रवेश कर जाते है। आइए आज हम बात करते है, जंग ए आजादी स्मारक करतारपुर जलंधर पंजाब के बारे में विस्तार सहित जानकारी (Jang-E-Azadi Memorial, Kartaarpur, Jalandhar, Punjab Information)।



आजादी से पहले वाले हथियार (Pre-Independence Weapons)


जंग ए आजादी स्मारक (Jang-E-Azadi Memorial) में आजादी से पहले के हथियारों को देखने का अवसर मिलता है। यह हथियार किसी समय राजाओं, अंग्रेजों, मुगलों और क्रांतिकारियों के द्वारा प्रयोग किए गए थे। इन हथियारों में तीर कमान, तलवारें, बंदूकें, तोपें, पट्टा, शमशीर, किलिज, खड़ग, किर्च और रिवाल्वर शामिल है। इनमें कुछ ऐसी भी बंदूकें है, जिनकी लंबाई दो मीटर तक है।  


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यहाँ पर 1918 ईस्वी की बनी मशीन गन भी रखी गयी है। इसके अलावा कई नाल वाली बंदूकें भी देखने को मिलती है। चकमकी बंदूक और तोड़ेदार बंदूक इस स्मारक में खासतौर पर देखी जाती है। चकमकी बंदूक में चकमक के पत्थर होते है, जो आग पैदा करते थे। जब बंदूक में बारूद डाला जाता था, तो चकमकी पत्थरों से आग पैदा होती थी। जिसके बाद बारूद चलता था। 


तोड़ेदार बंदूक में पहले बारूद भरा जाता था, उसके बाद उसमें पलीता लगाकर आग लगा दी जाती थी।  जिसके बाद काफी जबरदस्त विस्फोट होता था। सिखों के द्वारा चलाये गए कई शस्त्र देखने को मिलते है। इस स्मारक में 6 गैलरी का निर्माण किया गया है। हर गैलरी में आजादी की लड़ाई में लड़ने वाले शूरवीरों के चित्र और हथियारों को प्रदर्शित किया गया है। 



चन्दर शेखर आजाद का अस्थि कलश (Chandrasekhar Azad's Bone Urn)


आजादी की लड़ाई में एक बड़ा नाम चन्दर शेखर आजाद का है। जिन्होंने 27 फ़रवरी 1931 को देश की आजादी के लिए खुद को न्यौछावर कर दिया था। इलाहाबाद के पार्क में अंग्रेजों से लड़ते हुए, आखिरी गोली खुद को मार ली। उन्होंने कहा था कि "मैं आजाद हूँ, आजाद ही मरूंगा"  अपनी इसी बात को पूरा करने के लिए खुद को अंतिम गोली मार ली। 


आजाद के अस्थि कलश को उनके बहुत ही करीबी पंडित शिव विनायक मिश्र ने अपने पास संभाल कर रख लिया था। 1 अगस्त 1976 में वाराणसी विद्यापीठ ने एक शोभा यात्रा निकाली, जो 10 अगस्त 1976 को पंजाब के संग्रहालय में पहुंची। जिसके बाद अस्थि कलश यहीं पर रह गया। इस स्मारक में कई अंग्रेज अफसरों की मूर्तियां भी देखने को मिलती है। जिनमें जार्ज पंचम, क्वीन विक्टोरिया की मूर्तियां प्रमुख है। आजादी की लड़ाई पर बनी 15 मिनट की एक फिल्म भी दिखाई जाती है। 


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समय और शुल्क (Entry/Fees)


सैलानी सुबह 10 बजे से शाम 6 बजे तक घूम सकते है। यहाँ पर प्रवेश करने के लिए वयस्क 50 रुपए और बच्चे 30 रुपए शुल्क लगता है। बच्चों को अपने इतिहास के बारे में जानकारी देने के लिए बहुत ही बढ़िया स्थान है।

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