बुधवार, 25 नवंबर 2020

आइये जानिये छत्तीसगढ़ (chatisgarh) के प्रसिद्ध मंदिरों के बारे में विस्तार पूर्वक


दुनिया भर से लोग भारत के किसी ना किसी राज्य में घूमने के लिए हर साल बहुत बड़ी संख्या में आते है। भारत का हर राज्य अपनी सभ्यता और भौगोलिक स्थिति के कारण विश्व में प्रसिद्ध है। सैलानियों की मुख्य पसंद में छत्तीसगढ़ का नाम भी आता है। छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में प्राचीन 36 किले सैलानियों को सब से ज्यादा अपनी तरफ आकर्षित करते है। इस राज्य में जंगल, दुर्लभ जानवर और पुरानी इमारतें भी देखने को मिलती है। पुरानी इमारतों की वास्तुकला को देख कर दंग रह जाता है। 

यह राज्य धार्मिक दृष्टि से भी बहुत ही महत्वपूर्ण है। यहाँ के मंदिर अपनी सुंदरता और धार्मिक वातावरण के लिए बहुत प्रसिद्ध (Famous) है। हर साल बहुत बड़ी संख्या में भक्त और सैलानी इन मंदिरों में घूमने के लिए आते है। छत्तीसगढ़ के मंदिरों (Temples) के बारे में जानने के लिए आप हमारे इस लेख का जरूर पढ़े। इस लेख में हम आप को विस्तार पूर्वक जानकारी (Information) देने जा रहे है। 




कैवल्य धाम  (Kaivalya dham)  


कैवल्य धाम को जैन मंदिर के रूप में जाना जाता है। यह छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के प्रमुख मंदिरों में से एक है। इस मंदिर के परिसर में 26 छोटे और बड़े मंदिर है। यहाँ पर 24 जैन धर्म के धर्म गुरुओं की मूर्तियां स्थापित की गयी है। हर वर्ष बहुत बड़ी संख्या में जैन धर्म में विश्वास रखने वाले लोग नतमस्तक होने के लिए आते है। कैवल्य धाम सफ़ेद रंग के संगमरमर से बना हुआ है।  

यह मंदिर रायपुर शहर से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। जैन मंदिर बहुत बड़े भाग में फैला हुआ है। इसकी वास्तुकला को देख कर सैलानी मोहित हो जाते है। यहाँ पहुंचने के लिए रायपुर हवाई अड्डे से 40 मिनट लगते है। जैन धर्म के हिसाब से यहाँ भोजन भी परोसा जाता है। इस मंदिर का वातावरण बहुत ही शांत है। कैवल्या धाम में आने वाले लोगों को मन की शांति मिलती है। 



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बम्लेश्वरी देवी मंदिर (Bamleshwari Devi Temple)


बम्लेश्वरी देवी मंदिर गांव डोंगरगढ़ ज़िला राजनांदगांव छत्तीसगढ़ में स्थित है। इस मंदिर में हर साल दशहरा, राम नौवीं, दीपावली का त्यौहार बहुत ज्यादा धूमधाम के साथ मनाया जाता है। प्रति वर्ष बहुत बड़ी संख्या में भक्त देवी दर्शन के लिए आते है। यह मंदिर छत्तीसगढ़ के प्रमुख मंदिरों में से एक है। हिन्दुओं में इस मंदिर के प्रति अपार श्रद्धा है। बाडी बम्लेश्वरी मंदिर के नाम से भी इस मंदिर को जाना जाता है। यह 1600 फुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। 

यहाँ का वातावरण बहुत ही शांत और मन को असीम शांति प्रदान करने वाला है। प्रति वर्ष नवरात्रे के समय मंदिर में एक ज्योति कलश को जलाया जाता है, जिसे यहाँ के लोग बहुत ही पवित्र दृष्टि से देखते है। मंदिर के चारों तरफ पहाड़ियां ही पहाड़ियां देखने को मिलती है। बम्लेश्वरी देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए ट्राम का इस्तेमाल किया जाता है। यह ट्राम बहुत ही रोमांचक होती है।  



दंतेश्वरी मंदिर (Danteshwari temple) 


भारत के 52 शक्ति मंदिरों में से एक मंदिर का नाम दंतेश्वरी मंदिर है। दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा शहर में स्थित है। कहा जाता है कि देवी सती का दाँत टूट कर इस स्थान पर गिरा था। दाँत टूटकर गिरने की वजह से इस देवालय का नाम दंतेश्वरी पड़ा था। चालुक्यों ने इस मंदिर का निर्माण 14 वीं सदी में करवाया था। दंतेश्वरी देवी को छह भुजाओं वाली देवी कहा जाता है। मंदिर में देवी की काले रंग की मूर्ति स्थापित की गयी है। 

जंगल और पहाड़ियों के बीच बने इस मंदिर को देखने का नज़ारा बहुत ही अद्भुत होता है। यहाँ के आदिवासी लोग भी इस मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए आते है। देवी के इस मंदिर में पैरो के निशान भी बने हुए है। जिन लोगों को प्रकृति में रुचि है वह लोग इस स्थान पर जरूर घूमने के लिए आये। 



महामाया मंदिर (Mahamaya Temple) 


रतनपुर जिला बिलासपुर में महामाया मंदिर स्थित है। इस देवालय में देवी सरस्वती और देवी लक्ष्मी जी को पूजा जाता है। महामाया मंदिर 52 शक्ति पीठ मंदिरों में से एक है। 12 वीं सदी में इस मंदिर के बारे में लोगों को पता चला। विद्वानों का विचार है कि राजा रतन देव को माँ काली देवी ने साक्षात् अपने दर्शन दिए थे। यह मंदिर कोसलेश्वरी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।  


हर साल बहुत ज्यादा भक्त और सैलानी इस मंदिर के दर्शन के लिए आते है। महामाया मंदिर के कपाट रोज सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक खुले रहते है। सिर्फ गुरु नानक गुरुपर्ब को रात 12 बंद होते है। नागर शैली में इस मंदिर का निर्माण किया गया है। यह मंदिर 16 खम्भों पर स्थित है। कोसलेश्वरी मंदिर के गर्भ ग्रह में महामाया देवी की साढ़े तीन फुट की मूर्ति स्थापित है।  





भोरमदेओ मंदिर (Bhoramdeo Temple) 


भोरमदेओ मंदिर का इतिहास करीब 1000 साल पुराना है। यह शिवाला जिला कबीरधाम के चोराँगाव में स्थित है। यहाँ पर भगवान शिव की पूजा की जाती है। इस देवालय का निर्माण 1089 ई वी में नागवंशी शासक गोपाल देव ने करवाया था। कोणार्क और खुजराहों मंदिर से मिलती जुलती मंदिर की बनावट होने के कारण छत्तीसगढ़ का खुजराहों मंदिर भी कहा जाता है। 


हिन्दू धर्म के लोगों की इस देवस्थान में बहुत ज्यादा आस्था है। मैकल पर्वत की घाटी में भोरम देव मंदिर स्थित है। उत्तर दिशा में इस मंदिर का प्रवेश द्वार स्थित है। मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। इस भोरमदेओ देवालय में प्रवेश करने के लिए तीन द्वार है। तीनों द्वार मंडप तक जाते है। गर्भ गृह में कई देवी देवताओं की की मूर्तियों के साथ भगवान शिव की मूर्ति को भी स्थापित किया गया है। 




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चंद्रहासिनी देवी मंदिर (Chandrahasini Devi Temple) 


चंद्रहासनी देवी मंदिर हिन्दू धर्म को मानने वाले लोगों के लिए बहुत बड़ी आस्था का केंद्र है। यह जिला जांजगीर महानदी तट पर स्थित बहुत ही सुंदर मंदिर है। इस मंदिर को माँ चंद्रसेनी के नाम से भी जाना जाता है। माँ चंद्रसेनी मंदिर भारत के 52 शक्ति पीठ मंदिरों में से एक है। यहाँ पर स्थापित माँ चंद्रहासनी का मुख चन्द्रमा जैसा बना हुआ है। 

भक्तों की हर मनोकामना इस स्थान पर पूरी होती है। प्रतिदिन बहुत बड़ी संख्या में लोग इस देवालय में नतमस्तक होने के लिए आते है। नवरात्रे के दिनों में बहुत बड़ा समागम होता है। जिसमें बहुत बड़ी संख्या में लोग शामिल होने के लिए आते है। 



बंजारी माता मंदिर (Banjari Mata Mandir)


बंजारी माता मंदिर राय गढ़ शहर से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस देवालय का मुख्य आकर्षण तालाब है। जब हम इस तालाब को ऊपर से देखते है, तो इसका आकार भारत के नक़्शे की तरह से दिखाई देता है। बंजारी माँ की मूर्ति बगलामुखी स्थापित है। इस देवी की आराधना तंत्र मंत्र के लिए विशेष रूप से की जाती है। 


हिन्दू धर्म के अनुसार देवी की आराधना करने से जन्म मृत्यु से छुटकारा मिलता है। भक्त को मोक्ष की प्राप्ति होती है। देवालय के पीछे गौशाला और गुरुकुल का निर्माण किया गया। बंजारा जाति में जन्म लेने के कारण बंजारी कहा जाता है। 

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